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स्थान डग जिला झालावाड़ राजस्थान रिपोर्टर मोहम्मद इस्लाम काला सोना की फसल सबाब पर, खेत के समीप का वातावरण खुशबू से महक उठा डग राजस्थान में अफीम की फसल को लोग काला सोना के नाम से भी जानते हैं ,पहले झालावाड़ जिले में अफीम की खेती के लिये किसान को लाइसेंस लेना पडता है, किंतु सरकार द्वारा पटृटो की संख्या काफी कम कर दी गई ,अफीम पैदावार के लिए नारकोटिक्स विभाग में लाइसेंस लेने के बाद अफीम फसल बोने के साथ कडी मेहनत कर पैदावार बच्चों की तरह करते है ,अफीम फसल मे 100 से 120 दिनों में फूल आने लगते हैं, इस समय फसल में फूलों की महक से वातावरण खुशबू से महक उठा, डोडे बड़े होते के साथ फूल झड़ जाते हैं डोडे पक जाने के बाद उसमें किसान चिरा लगाकर डोडे को रात भर छोड़ देता है ,अगले दिन प्रातः धूप निकलने से पूर्व कांटे की मदद से तरल पदार्थ ( दूध) निकाल कर एक बर्तन में प्रतिदिन एकत्रित करते हैं, जब डोड़े को सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है किसानों को अफीम चोरी होने के भय से वह रात जगा भी करते हैं , तरल पदार्थ सुख जाने के बाद काला हो जाता है जिसको लोग काला सोना अफीम के नाम से भी जानते हैं, चिरा लगाते ही किसानों की नींद उड़ जाती है चोरी होने का भय सताने लगता है अफीम डोडे मे चीरा लगाने के साथ जब तक अफीम सरकार खरीदना ना ले तब तक उसकी आंखों की नींद उड जाती है पर्याप्त मात्रा में अफीम ना होने पर पटृटा कटने का डर अफीम की फसल को बचाने के लिए किसान को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे अफीम की फसल में बीमारी पत्ता सूखने , काली मस्सी रोग व पक्षियों से भी बचाना काफी मुश्किल होता है , निश्चित मात्रा में अफीम की पैदावार ना होने पर पटृटा कटने का दर्द सताता है, तोते से बचाने हेतु नेट लगा दी ताकि पक्षी उसको खा ना सके डोड़े भी बिकते हैं डोड़े सूख जाने के बाद उसमें से दाने निकलते जिसको खसखस भी बोलते हैं, वह बाजार में अच्छे भाव में बिक जाते हैं ,वही खाली डोड़े का बुरा भी सरकार खरीदती है, अफीम किसान सूरेश चंद्र ने बताया कि सी पी सी योजना अंतर्गत पट्टे दिए गए जिसमें निरोगी फसल होने के बाद भी उसमें हम चीरा नहीं लगा सकते हमें वैसे ही विभाग को डोड़े सहित तुलाई कराना है अफीम किसान सुरेश चंद जैन शांतिलाल जैन अमित राठौर विक्रम लाल चंद अभय कुमार ने बताया कि फसल में कीड़ा भी लग चुका है अफीम दूध की मात्रा भी काम बैठने का असर है

स्थान डग
जिला झालावाड़ राजस्थान
रिपोर्टर मोहम्मद इस्लाम

काला सोना की फसल सबाब पर, खेत के समीप का वातावरण खुशबू से महक उठा

डग राजस्थान में अफीम की फसल को लोग काला सोना के नाम से भी जानते हैं ,पहले झालावाड़ जिले में अफीम की खेती के लिये किसान को लाइसेंस लेना पडता है, किंतु सरकार द्वारा पटृटो की संख्या काफी कम कर दी गई ,अफीम पैदावार के लिए नारकोटिक्स विभाग में लाइसेंस लेने के बाद अफीम फसल बोने के साथ कडी मेहनत कर पैदावार बच्चों की तरह करते है ,अफीम फसल मे 100 से 120 दिनों में फूल आने लगते हैं, इस समय फसल में फूलों की महक से वातावरण खुशबू से महक उठा, डोडे बड़े होते के साथ फूल झड़ जाते हैं डोडे पक जाने के बाद उसमें किसान चिरा लगाकर डोडे को रात भर छोड़ देता है ,अगले दिन प्रातः धूप निकलने से पूर्व कांटे की मदद से तरल पदार्थ ( दूध) निकाल कर एक बर्तन में प्रतिदिन एकत्रित करते हैं, जब डोड़े को सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है किसानों को अफीम चोरी होने के भय से वह रात जगा भी करते हैं , तरल पदार्थ सुख जाने के बाद काला हो जाता है जिसको लोग काला सोना अफीम के नाम से भी जानते हैं,

 

चिरा लगाते ही किसानों की नींद उड़ जाती है चोरी होने का भय सताने लगता है
अफीम डोडे मे चीरा लगाने के साथ जब तक अफीम सरकार खरीदना ना ले तब तक उसकी आंखों की नींद उड जाती है

 

पर्याप्त मात्रा में अफीम ना होने पर पटृटा कटने का डर

अफीम की फसल को बचाने के लिए किसान को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे अफीम की फसल में बीमारी पत्ता सूखने , काली मस्सी रोग व पक्षियों से भी बचाना काफी मुश्किल होता है , निश्चित मात्रा में अफीम की पैदावार ना होने पर पटृटा कटने का दर्द सताता है, तोते से बचाने हेतु नेट लगा दी ताकि पक्षी उसको खा ना सके

डोड़े भी बिकते हैं
डोड़े सूख जाने के बाद उसमें से दाने निकलते जिसको खसखस भी बोलते हैं, वह बाजार में अच्छे भाव में बिक जाते हैं ,वही खाली डोड़े का बुरा भी सरकार खरीदती है,
अफीम किसान सूरेश चंद्र ने बताया कि सी पी सी योजना अंतर्गत पट्टे दिए गए जिसमें निरोगी फसल होने के बाद भी उसमें हम चीरा नहीं लगा सकते हमें वैसे ही विभाग को डोड़े सहित तुलाई कराना है
अफीम किसान सुरेश चंद जैन शांतिलाल जैन अमित राठौर विक्रम लाल चंद अभय कुमार ने बताया कि फसल में कीड़ा भी लग चुका है अफीम दूध की मात्रा भी काम बैठने का असर है

 

 

 

 

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