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शीर्षक – घूमती है पुतली, देखता कहीं और है। डॉ एच सी विपिन कुमार जैन”विख्यात”

शीर्षक – घूमती है पुतली, देखता कहीं और है।
डॉ एच सी विपिन कुमार जैन”विख्यात”

एक मुर्दा डॉक्टर ने,
कंपाउंडर से कहा-
इस मुर्दे की आंख का ऑपरेशन होना ।
लाओ, औजार की थाली
खोल दें, आंख इसकी जो है सवाली।
इसकी नजर में खोट है।
घूमती है पुतली, देखती कहीं और है,
तीर कहीं और निशाना कहीं और है।
बात करते-करते मैडम की तरफ घूम गया,
थोड़ा नशे में था, सो झूम गया।
बड़ा ही घमंड था, रूतबे और दौलत पर,
अब यहां पड़ा है, बेसुध होकर टेबुल पर।
चप्पल और जूते की हुई बरसात,
फिर कहां गई इसकी साख।
पड़ोसियों ने भी जमकर की कुटाई
फूटी आंख लेकर आया है, मेरा भाई।
जी तो चाहता है, इसकी आंख खोल दूं।
मगर इसकी नियत में ही खोट है,
न औजार से आंख खुलती है, और ना सही बात इसके भेजे में घुसती है ।

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